भैरव जयंती क्यों मनाई जाती है?
काल भैरव जयंती, जिसे भैरव अष्टमी या कालाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण त्योहार है। यह दिन भगवान शिव के रौद्र (उग्र) और शक्तिशाली स्वरूप भगवान काल भैरव के प्रकट होने (अवतरण) के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। यह हिंदू धर्म के पवित्र महीने कार्तिक या मार्गशीर्ष में ढलते चंद्रमा के पखवाड़े में आठवें चंद्र दिवस पर पड़ता है।
काल भैरव जयंती तिथिदिन:
बुधवार, 12 नवंबर 2025 अष्टमी तिथि प्रारंभ: 11 नवंबर 2025, रात 11:08 बजे अष्टमी तिथि समाप्त: 12 नवंबर 2025, रात 10:58 बजे
काल भैरव जयंती पौराणिक कथा
काल भैरव जयंती मनाने के पीछे एक पौराणिक कथा है, जो इस प्रकार है, शिवपुराण के अनुसार कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी को भगवान शिव के रक्त से भैरव की उत्पत्ति हुई थी, अतः इस तिथि को भैरवाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार अंधकासुर नामक दैत्य अपने कृत्यों से अनीति व अत्याचार की सीमाएं पार कर रहा था, यहाँ तक कि एक बार घमंड में चूर होकर वह भगवान शिव के ऊपर आक्रमण करने का दुस्साहस कर बैठा. तब उसके संहार के लिए शिव के रक्त से भैरवनाथ की उत्पत्ति हुई।एक अन्य पुराणों के अनुसार भगवान् शिव के अपमान-स्वरूप भैरव की उत्पत्ति हुई थी। यह सृष्टि के प्रारंभकाल की बात है। सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने भगवान शंकर की वेशभूषा और उनके गणों की रूपसज्जा देख कर शिव को तिरस्कार युक्त वचन कहे। अपने इस अपमान पर स्वयं शिव ने तो कोई ध्यान नहीं दिया, किन्तु उनके शरीर से उसी समय क्रोध से कम्पायमान और विशाल दण्डधारी एक प्रचण्डकाय काया प्रकट हुई और वह ब्रह्मा का संहार करने के लिये आगे बढ़ आयी। उस समय ब्रह्मा जी के पाँच मुख हुआ करते थे तथा ब्रह्मा जी पाँचवे वेद की भी रचना करने जा रहे थे,सभी देवो के कहने पर महाकाल भगवान शिव ने जब ब्रह्मा जी से वार्तालाप की परन्तु ब्रह्मा जी के ना समझने पर महाकाल से उग्र,प्रचंडरूप भैरव ने अपने नाख़ून के प्रहार से ब्रह्मा जी की का पाँचवा मुख काट दिया, तब भगवान शंकर द्वारा मध्यस्थता करने पर ही वह काया शांत हो सकी। रूद्र के शरीर से उत्पन्न उसी काया को महाभैरव का नाम मिला। परन्तु इससे भैरव को ब्रह्मा हत्या का पाप भी लगा। परन्तु भगवान शिव की सहायता से भैरव को काशी में ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिली और बाद में भगवान शिव ने उन्हें अपनी पुरी, काशी का नगरपाल नियुक्त कर दिया। ऐसा कहा गया है कि भगवान शंकर ने इसी अष्टमी को ब्रह्मा के अहंकार को नष्ट किया था, इसलिए यह दिन भैरव अष्टमी व्रत के रूप में मनाया जाने लगा। भैरव अष्टमी ‘काल’ का स्मरण कराती है, इसलिए मृत्यु के भय के निवारण हेतु बहुत से लोग भैरव की उपासना करते हैं। भैरव की पत्नी देवी पार्वती की अवतार हैं जिनका नाम भैरवी है जब भगवान शिव ने अपने अंश से भैरव को प्रकट किया था तब उन्होंने माँ पार्वती से भी एक शक्ति उत्पन्न करने को कहा जो भैरव की पत्नी होंगी तब माँ पार्वती ने अपने अंश से देवी भैरवी को प्रकट किया जो शिव के अवतार भैरव की पत्नी हैं |इसलिए काशी में श्री काशीविश्वनाथ मंदिर और उज्जैन में श्री महाकाल मंदिर में भगवान शिव के दर्शन के बाद जब तक भैरव जी के दर्शन न करें तो न ही श्री महाकाल ज्योतिर्लिंग और न ही श्री विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शनों का फल नहीं मिलता।…
ब्रह्मा जी का अहंकार: एक बार भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच बहस छिड़ गई कि उनमें से श्रेष्ठ कौन है। ब्रह्मा जी ने अहंकारवश भगवान शिव का अपमान किया और दावा किया कि वह सृष्टि के सर्वोच्च देवता हैं।
ब्रह्मा जी का सिर का कटना: काल भैरव ने अपने एक नाखून से ब्रह्मा जी के पांचवें सिर को काट दिया, जो उनके अहंकार का प्रतीक था। इस घटना से यह संदेश दिया गया कि किसी को भी अपने अहंकार के कारण भगवान का अपमान नहीं करना चाहिए।
पापों से मुक्ति: इस दिन भगवान काल भैरव की पूजा करने से भक्तों को सभी प्रकार के भय, पापों और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति मिलती है। यह दिन बुराई पर अच्छाई की जीत और अहंकार के नाश का प्रतीक है।
पूजा का महत्व: इस दिन पूजा करने से राहु-केतु और शनि दोष भी दूर होते हैं। भगवान काल भैरव को “काशी का कोतवाल” भी कहा जाता है, और सभी शक्तिपीठों में उनकी उपस्थिति एक रक्षक देवता के रूप में मानी जाती है।
काल भैरव मंत्र॥ ॐ भैरवाय नमः
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